डॉ. हुकमचन्द जैन : पूरे भारत में पढ़ी जाती हैं जिनकी इतिहास की पुस्तकेंकतरनें
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जैन जनवाणी, अक्टूबर 2023, पृष्ठ 41
पूरे भारत में पढ़े जाने वाले इतिहासकार
अक्टूबर 2023 में ‘जैन जनवाणी’ ने डॉ. हुकम चन्द जैन पर पूरा एक पृष्ठ प्रकाशित किया। लेखक, कोटा के पत्रकार डॉ. प्रभात कुमार सिंघल, ने उन्हें देश के उन इतिहासकारों में गिना जिनकी पुस्तकें न केवल पूरे भारत में पढ़ी जाती हैं, बल्कि सिविल सेवा और आरपीएससी की हर परीक्षा के अभ्यर्थियों के लिए उपयोगी हैं।
लेख में डॉ. जैन का यह कथन भी है कि उनकी पुस्तकें अंडमान-निकोबार तक और विदेशों में भारतीय इतिहास के पाठकों तक पहुँचती हैं।
शोध के प्रति जुनून
सिंघल उनके इतिहास-प्रेम को जुनून कहते हैं: वे सदा अध्ययन या लेखन में लगे रहते हैं। पर्यवेक्षक के रूप में उन्होंने 19 एम.फिल. और 10 पीएच.डी. शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया है। भट्टारक सम्प्रदाय और जैन समाज जैसे विषयों पर उनके 18 मौलिक शोध-पत्र राष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हैं, और 25 से अधिक सेमिनारों में उन्होंने शोध-पत्र पढ़े हैं।
उनके शोध का एक विचार विशेष है: मध्यकालीन बही-खातों के अध्ययन से राजस्थान का आर्थिक इतिहास जोड़ा जा सकता है। इतिहास के शिक्षकों के प्रशिक्षण और रिफ्रेशर कोर्स में उन्हें रिसोर्स पर्सन के रूप में भी बुलाया जाता रहा है।
पुस्तकें जिन्होंने परीक्षा की तैयारी को दिशा दी
लेख के अनुसार वे लगभग चार दशकों से पूरे भारत के प्रतियोगी परीक्षार्थियों के लिए मानक संदर्भ पुस्तकें लिख रहे हैं। उस समय ‘आधुनिक विश्व इतिहास 1500–2000’ का 29वाँ हिन्दी संस्करण आने वाला था; अंग्रेज़ी में इसके 17 और मराठी में 10 संस्करण आ चुके थे, गुजराती अनुवाद तैयार हो रहा था, और कई विश्वविद्यालय इसे एम.ए. और बी.ए. ऑनर्स के लिए अनुशंसित करते थे।
डॉ. नारायण लाल माली के साथ राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी के लिए लिखी उनकी राजस्थान इतिहास की पुस्तक के तब तक 32 संस्करण आ चुके थे, और यह अकादमी की पहली पुस्तक थी जिसकी 21,000 प्रतियाँ एक साथ छपीं। लेख में ‘भारत का इतिहास’ (13 संस्करण, राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा बी.ए. के लिए अनुशंसित), बी.ए. के लिए दो भागों का भारत का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास, भारतीय ऐतिहासिक स्थल कोश, भारतीय इतिहास एवं संस्कृति का विश्वकोश, ‘राइज़ ऑफ़ मॉडर्न वेस्ट’ (डिब्रूगढ़, असम, 2020) और वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय के लिए लिखी पाठ्य-सामग्री का भी उल्लेख है।
सम्मान
लेख में महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन का महाराणा कुंभा पुरस्कार (2009); शैक्षणिक योगदान के लिए 2009 में कानपुर में गुजरात के पूर्व राज्यपाल पं. नवल किशोर शर्मा द्वारा सम्मान; ‘भारत के जल पुरुष’ राजेन्द्र सिंह द्वारा सम्मान; 2013 में अमेरिकी लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस में उनकी कृतियों का शामिल होना, जिसे लेख दुर्लभ सम्मान कहता है; और 2022 में नई दिल्ली में जैन वर्ल्ड मिशन द्वारा जैन धर्म रत्न अंतर्राष्ट्रीय सम्मान का उल्लेख है। कोटा का जैन समाज और अन्य संस्थाएँ भी उन्हें कई बार सम्मानित कर चुकी हैं।
महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जीवन
सिंघल उनके सफ़र को विजयनगर महाविद्यालय, अजमेर (1978–1982) से राजकीय महाविद्यालय, कोटा तक दर्ज करते हैं, जहाँ 1982 में आरपीएससी से प्रथम स्थान पर चयन के बाद वे पहुँचे। 1997 में वे इतिहास विभाग के अध्यक्ष बने, 2002 से 2005 तक बूंदी महाविद्यालय में रहे, और बाद में प्राचार्य बने। इस दौरान वे राष्ट्रीय सेवा योजना अधिकारी रहे, अलीगढ़ में मध्यकालीन इतिहास की कार्यशाला में भाग लिया, और 23 वर्षों तक वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय के इतिहास परामर्शदाता रहे।
वे 13 वर्षों तक कोटा विश्वविद्यालय के इतिहास अध्ययन मंडल के संयोजक और प्रबंध मंडल के सदस्य रहे, एमडीएस विश्वविद्यालय, अजमेर के अध्ययन मंडल और राजस्थान बोर्ड की पाठ्यपुस्तक पुनर्निरीक्षण समिति के सदस्य रहे। 2022 से वे राजस्थान विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद के सदस्य हैं, और जय मिनेश आदिवासी विश्वविद्यालय तथा सोफ़िया गर्ल्स पीजी कॉलेज, अजमेर में इतिहास अध्ययन मंडल के समन्वयक हैं। उन्होंने स्वामी विवेकानंद, सुभाष चन्द्र बोस और महात्मा गांधी पर व्याख्यान दिए, कोविड काल में विश्वविद्यालयों के वेबिनारों में मुख्य वक्ता रहे, और 14 वर्षों से अकलंक शोध संस्थान से जुड़े हैं, अब अध्यक्ष हैं।
लेख उस बात पर समाप्त होता है जो शायद सबसे अहम है: वर्षों से उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं के सैकड़ों विद्यार्थियों को निःशुल्क पढ़ाया है, और उनके विद्यार्थी पूरे भारत में हैं।
यह लेख समाचार-पत्र के लेख का हमारे अपने शब्दों में सार है। पूरी कतरन ऊपर दी गई है।

