डॉ. जैन से पूछे जाने वाले बहुत से प्रश्न मन पर लौटते हैं। मन इतना अशांत क्यों रहता है? छोटी-सी असफलता इतनी भारी क्यों लगती है? कुछ लोग पहली कठिनाई पर ही हिम्मत क्यों हार जाते हैं? छोटी-छोटी वार्ताओं की एक कड़ी में वे इनका एक-एक कर उत्तर देते हैं, सरल भाषा में, और इतिहास, रसोई और साधुओं के जीवन के उदाहरणों के साथ।

उनका मूल विचार सीधा है: कोई भी मजबूत मन लेकर पैदा नहीं होता। शरीर की तरह मन को भी रोज़ के छोटे अभ्यास से प्रशिक्षित किया जाता है।

बेलगाम घोड़ा

मन को शांत रखें

हमारा मन, वे कहते हैं, पीपल के पत्तों जैसा है, जो ज़रा-सी हवा में हिलने लगते हैं; या बिना लगाम के घोड़े जैसा, जो बस दौड़ा जा रहा है। अशांत मन से निर्णय गलत होते हैं, काम अधूरे रहते हैं, और धीरे-धीरे बीमारियाँ भी आती हैं।

उनका पहला उपाय साँस है: चौबीस घंटों में से दस मिनट धीमी, ध्यान भरी साँसों को दीजिए। दूसरा, वर्तमान में रहिए। भूत पर ध्यान देने से हम दुखी रहते हैं, भविष्य पर ध्यान देने से चिंतित। महावीर और बुद्ध ने शांत रहना सीखा, और सदा व्यस्त रहने वाले कौटिल्य ने भी मन को शांत रखना सीख लिया था, तभी उनके निर्णय सही होते थे। विचार आएँ तो उन्हें बहने दीजिए; एक विचार से दूसरे की कड़ी मत बनाइए। फिर भी मन शांत न हो तो पेड़-पौधों के पास जाइए, या कोई अच्छा काम कीजिए।

मन एक घोड़े के समान है जो अनियंत्रित है।

छोटी सफलताएँ, मजबूत मन

मन को मजबूत बनाएं

कुछ लोगों के पास सब कुछ होता है, वे कहते हैं, फिर भी मन कमज़ोर होता है: वे छोटी-छोटी बातों से घबरा जाते हैं और पहले ही तय कर लेते हैं कि यह काम उनसे नहीं होगा। उनकी सलाह है कि छोटे-छोटे काम से शुरुआत करें। हर छोटी सफलता से मनोबल बढ़ता है, और मन मजबूत होता है।

हमारी कमज़ोरी का बड़ा हिस्सा यह डर है कि लोग क्या कहेंगे: मित्र, पड़ोसी, रिश्तेदार। जीवन आपका है, वे विद्यार्थियों को याद दिलाते हैं। जो आज आपको कमज़ोर या नासमझ कहते हैं, वही कल सफल होने पर आपकी तारीफ़ करेंगे। प्री निकाल लिया तो मेंस क्यों नहीं, और फिर इंटरव्यू क्यों नहीं? जैन साधुओं को देखिए, जो जेठ की गर्मी में नंगे पैर लंबी यात्राएँ पूरी कर लेते हैं। विवेकानंद और गांधी, दोनों ने निडर होने की शिक्षा दी।

आप जब तक डरोगे, लोग डराएंगे।

मस्तिष्क को प्रशिक्षित कीजिए

मानसिक रूप से मजबूत बनो

हम अच्छे कपड़े पहनते हैं, कई तरह के अभ्यास करते हैं, वे कहते हैं, पर मस्तिष्क को प्रशिक्षण नहीं देते। मानसिक मजबूती व्यक्तित्व, सफलता और रिश्तों के लिए ज़रूरी है, और यह पैदाइशी नहीं होती। यह अभ्यास, अनुशासन और धैर्य से धीरे-धीरे बनती है; मस्तिष्क बदल सकता है, उसे प्रशिक्षित किया जा सकता है।

शुरुआत नकारात्मक विचारों को पहचानने और उन्हें बाहर निकालने से कीजिए: क्या मैं असफल हो जाऊँगा? क्या मैं आगे नहीं बढ़ पाऊँगा? फिर, जैसा मनोवैज्ञानिक सिखाते हैं, स्थिति के बारे में अपनी सोच बदलिए। जब भी लगे कि आप फिसल रहे हैं, रुककर शांति से पूछिए कि मैं नकारात्मक क्यों हो रहा हूँ। यह प्रश्न ही, वे कहते हैं, मजबूती बनाने लगता है।

जब मन उदास हो

उदास मन से मुक्ति

मन शरीर से अलग नहीं है, वे बताते हैं; उदास मन धीरे-धीरे बीमारियों के रूप में सामने आता है। इसलिए कारण खोजिए। जैसा बुद्ध ने कहा, हर घटना का कोई कारण होता है। अक्सर हमने किसी छोटी बात को बड़ा बना लिया होता है, या भविष्य की ओर चिंता से देख रहे होते हैं।

इसके बाद दो व्यावहारिक सुझाव। उदास मन के साथ मत सोइए, क्योंकि वह पूरी रात असर करता है और सुबह आप तरोताज़ा नहीं उठते; सोने से पहले मन को एक प्रसन्न विचार दीजिए। और जब उदासी भारी हो, तो आसपास का वातावरण बदलिए: कमरे की धूल झाड़िए, अलमारी और किताबें जमाइए, बगीचे में टहलिए, या किसी मित्र को चाय पर बुलाइए, या उसके घर चाय पीने चले जाइए।

उदासी आपकी कोई संपत्ति नहीं है। यह आपकी विपत्ति है।

मन की दीवार गिराइए

मन की दीवार तोडें

बरसों में, वे कहते हैं, हम पुराने अनुभवों, पुराने दर्द और पुरानी यादों से मन में एक दीवार बना लेते हैं। वह हमें बदलने से रोकती है, और जब भी नया अवसर आता है, पीछे खींच लेती है: कहीं फेल हो गए तो, कहीं नुकसान हो गया तो, नई जगह में दिक्कत आई तो?

आपको कोई नया व्यक्ति नहीं बनना है, वे कहते हैं, बस जो हैं उसी का रूपांतरण करना है। रोज़ सुबह पाँच मिनट दीजिए: थोड़ा टहलिए और सोचिए कि कहीं कोई पुराना कष्ट आज आपको पीछे तो नहीं खींच रहा। रोज़ ऐसा करेंगे तो दीवार ईंट-ईंट करके गिरेगी, और अगला अवसर आने पर आप उसका लाभ उठा सकेंगे।

मन की क्रांति

मन में क्रांति लावें

इतिहासकार के रूप में उन्होंने फ्रांस, रूस और अमेरिका की क्रांतियाँ पढ़ाई हैं, जिन्होंने समाज, अर्थव्यवस्था और प्रशासन बदल दिए। भारत, वे कहते हैं, शांतिप्रिय देश रहा है, और यह अच्छी बात है। पर वे एक दूसरी क्रांति की बात करते हैं: मन के भीतर की क्रांति।

मन को वैसे धोइए जैसे वाशिंग मशीन कपड़े साफ़ करती है, वे कहते हैं। ईर्ष्या और भेदभाव निकालिए, मन को निर्मल बनाइए। अवचेतन मन में अटूट खज़ाना है: वह जो मानता है, चेतन मन उसी पर चलने लगता है। उसे बताइए कि आप निर्बल हैं, तो निर्बल हो जाएँगे। कंप्यूटर की प्रोग्रामिंग की तरह उसे प्रशिक्षित कीजिए, तो आप पाएँगे कि आप आगे बढ़ते जा रहे हैं।

मन में थोड़ी जगह खाली रखिए

मस्तिष्क को सर्जनात्मक बनाएं और मन को खाली रखें

उनके लिए सृजनात्मकता ‘क्यों’ पूछने से शुरू होती है। क्या आप विचारों को केवल इसलिए अपना लेते हैं कि दूसरे ऐसा करते हैं? रसोई को देखिए: छोटे-छोटे बदलावों से ऐसी रेसिपी बन गईं जिनकी किसी ने कल्पना नहीं की थी, और बच्चे वह घर पर खाने लगे जो पहले बाज़ार से आता था। जब पढ़ें कि गाजर आँखों के लिए अच्छी है, तो कारण जानिए। लोग पीपल को पूजते हैं, तो पूछिए कि यह परंपरा किस चीज़ की रक्षा करती है। अरस्तू और प्लेटो ने, और बाद में फ्रांसिस बेकन ने, दुनिया को तर्क खोजना सिखाया।

नए विचारों को जगह भी चाहिए। अगर आप सुबह से शाम तक स्क्रीन पर, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप पर रहेंगे, तो कुछ नया नहीं आ सकता। मन का एक हिस्सा खाली रखिए, वे कहते हैं, और हाथों से कुछ नया कीजिए।

सबसे कीमती आप स्वयं हैं

स्वयं को मजबूत बनाएं

एक दिन, वे कहते हैं, उन्होंने स्वयं से पूछा कि दुनिया में सबसे कीमती क्या है: पैसा, सोना, ज़मीन, बैंक बैलेंस? लोग इनके पीछे ऐसे दौड़ रहे हैं कि न घर के लिए समय है, न अपने लिए। फिर समझ आया: सबसे कीमती मनुष्य स्वयं है। आप नहीं, तो यह सब बेकार है।

इसलिए रोज़ सुबह आधा घंटा स्वयं को दीजिए: दस मिनट हल्का व्यायाम, दस मिनट साँस की क्रिया, और दस मिनट कुछ पढ़ना। मोटिवेशनल वीडियो आते-जाते रहेंगे, वे कहते हैं, पर अनुशासन रहता है, और अनुशासन ही आगे बढ़ाता है। ऐसे सकारात्मक लोगों का दायरा रखिए जो अच्छा ज्ञान और अच्छी ऊर्जा दें।

डॉ. जैन के अपने वीडियो से लिखा गया।