तीन दशक से अधिक शिक्षक रहे डॉ. जैन ने जीवन भर लोगों से बात की है: विद्यार्थियों, सहकर्मियों, श्रोताओं से। कई वार्ताओं में वे बताते हैं कि प्रतिक्रिया, वाणी और संबंधों के बारे में उन्होंने क्या सीखा।

ये विचार उनकी चार वार्ताओं और 2025 के साक्षात्कार से हैं, जहाँ उन्होंने माना कि पहले वे भी बहुत प्रतिक्रिया देते थे।

भीतर का दुश्मन

प्रतिक्रिया से बचें

क्या आप जल्दी प्रतिक्रिया देते हैं, वे पूछते हैं, मित्रों के बीच, काम पर, घर में? हर जल्दबाज़ प्रतिक्रिया का मूल्य चुकाना पड़ता है: मानसिक संतुलन, समय, चेहरे की चमक। आप सोचते हैं कि आप जीत गए, पर आप किसी शास्त्रार्थ में नहीं हैं। सामने वाले की बात सुनिए, वह गलत भी हो तो, और ऐसे शब्द मत बोलिए जिससे उसे नीचा देखना पड़े। प्रतिक्रिया, वे कहते हैं, एक दुश्मन है, जो हमारे भीतर बैठा है जबकि हम दुश्मन बाहर ढूँढते हैं।

बाहर दुश्मन ना ढूँढें आप। अपने दुश्मन को पहचानें।

प्रतिक्रिया की क़ीमत

जल्दबाज़ प्रतिक्रिया, वे कहते हैं, केवल बातचीत ही नहीं बिगाड़ती। वह मतभेद को लोगों के बीच मनभेद में बदल सकती है, दफ़्तर में, परिवार में या मित्रों के बीच, और उसे ठीक करने में लंबा समय लग सकता है। इससे ऊर्जा नष्ट होती है, मन की शांति जाती है और व्यक्तित्व पर असर पड़ता है। प्रतिक्रिया क्रोध और तनाव भी लाती है, जो, वे चेताते हैं, पूरे शरीर को बिगाड़ देते हैं। इससे बचिए, तो आप रचनात्मकता की ओर बढ़ते हैं: लेखक बेहतर लिखता है, विचारक अधिक खुलकर सोचता है।

बुद्ध ने उत्तर नहीं दिया

आरजे सावी के साथ बातचीत (2025)

2025 के साक्षात्कार में उन्होंने उस व्यक्ति की कथा सुनाई जिसने महात्मा बुद्ध को बहुत गालियाँ दीं, और बुद्ध ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। शिष्यों को बुरा लगा, पर बात सीधी थी: जैसे ही आप प्रतिक्रिया देते हैं, सामने वाले को शक्ति मिलती है और वह दुगनी बुराई करता है। यह घर में भी होता है, वे कहते हैं। यह एक अभ्यास है: आज दस बार प्रतिक्रिया देते हैं, तो दो बार देने की कोशिश कीजिए। पहले वे स्वयं बहुत प्रतिक्रिया देते थे, और धीरे-धीरे सीखा कि प्रतिक्रिया से शक्ति जाती है।

जैसे ही आप प्रतिक्रिया दोगे, सामने वाले को स्ट्रेंथ मिलेगी।

क्रोध भी आपका हिस्सा है

इसका अर्थ यह नहीं कि आप कुछ महसूस ही न करें। एक ज्ञानी ने उनसे कहा था कि गुस्सा अपने आप में बुरा नहीं: गरम पानी स्वभाव से गरम है, और आप गरम पानी को ठंडा करने की कोशिश कर रहे हैं। डर, गुस्सा, निराशा, सब व्यक्तित्व का हिस्सा हैं। उन्हें आने दीजिए, स्वागत कीजिए, और जाने दीजिए। बस उन्हें दिल में बसने मत दीजिए।

आने दीजिए, वेलकम कीजिए, और जाने दीजिए।

शांति ख़रीद लेना

प्रतिक्रिया पर लगाम लगावें

एक लंबी वार्ता में वे याद करते हैं कि अमेरिका में वैज्ञानिक उनके भाई ने चालीस साल पहले कहा था: “हुकम, हो सके तो शांति ख़रीद लेना।” एक प्रतिक्रिया मतभेद को मनभेद बना सकती है, और कुछ दिन बाद अक्सर लगता है कि बात महत्वपूर्ण ही नहीं थी। प्रतिक्रिया से पहले रुकिए।

सरल बोलिए

संवाद की कला

बहुत से लोग मंच से डरते हैं या घर में अपनी बात स्पष्ट नहीं रख पाते। बोलने के उनके नियम: डर नहीं, विषय की स्पष्टता, सरल भाषा जो श्रोता के दिल में उतरे, ठहराव, और लंबी बात हो तो कोई कहानी या उदाहरण। रोज़ पाँच मिनट आईने के सामने बोलिए, अपना वीडियो बनाइए, परिवार और मित्रों से राय लीजिए। चालीस साल पहले, वे कहते हैं, वे आज से बहुत अलग बोलते थे; यह अभ्यास है।

पंक्तियों के बीच सुनिए

लोगों से जुड़ने के लिए, वे कहते हैं, सामाजिक और भावनात्मक समझ चाहिए। स्वयं से पूछिए कि सामने वाले को क्या चाहिए, कैसी मदद चाहता है, उसके दिल में क्या दर्द है। वह जल्दी नहीं बताएगा; जुड़ जाएँगे तो शायद बताए। उसकी आँखें और हाव-भाव पढ़िए। वक्ता के अच्छे श्रोता बनिए। और जब उसने आप पर भरोसा करके कुछ बताया है, तो उसे अपने तक रखिए: वह बात साझा करने की नहीं। सलाह तब दीजिए जब वह चाहे।

लोगों के दिल में जगह

लोगों से जुड़ने की कला

एक बार कोई दूर से केवल यह बताने आए कि वे यूट्यूब पर बहुत अच्छा बोलते हैं, और पूरे दिन उनकी ऊर्जा बढ़ी रही। इसलिए सही हो तो दूसरों की प्रशंसा कीजिए। लोग पंक्तियों के बीच क्या कहते हैं, उसे समझिए; धैर्य से सुनिए; कभी मज़ाक मत उड़ाइए; और उनकी कही बात अपने तक रखिए।

डॉ. जैन के अपने वीडियो से लिखा गया।