बदलाव एक ऐसा विषय है जिस पर डॉ. जैन अक्सर लौटते हैं, और केवल इतिहास में नहीं। इतिहासकार देखता है कि कैसे भाप के जहाज़ों ने पाल वाली नावों की जगह ली, और कैसे स्थायी लगने वाली परंपराएँ चुपचाप बदल गईं। अपने शॉर्ट्स में वे यही दृष्टि रोज़ के जीवन पर डालते हैं: हम दूसरों पर कैसे संदेह करते हैं, किसी के आकर उठाने की प्रतीक्षा करते हैं, अतीत से चिपके रहते हैं, और एक असफलता के बाद हिम्मत हार जाते हैं।
उनका संदेश आशा भरा है। कोई आपको उठाने नहीं आएगा, वे कहते हैं, पर इसकी ज़रूरत भी नहीं। यह आप स्वयं कर सकते हैं।
अपनी सोच बदलिए
जब कोई लड़की आईएएस की तैयारी शुरू करती है, या कोई लड़का आरएएस या आईआईटी की, वे कहते हैं, तो हम मन ही मन सोचते हैं कि यह बहुत कठिन है, और उन्हें कुछ छोटा करने की सलाह दे देते हैं। पटवारी या शिक्षक बनना गलत नहीं है, पर किसी का हौसला नीचा करना गलत है। उन पर भरोसा कीजिए, चाहे अपना बच्चा हो या पड़ोस का।
ट्रेन में हमें यक़ीन रहता है कि कोई जेबकतरा पास है; यह क्यों नहीं सोचते कि कुछ भी नहीं होगा? वे 1807 में हडसन नदी पर रॉबर्ट फुल्टन की भाप से चलने वाली नाव ‘क्लेरमॉन्ट’ को याद करते हैं। किनारे पर खड़ी भीड़ को पक्का था कि वह डूब जाएगी, या रुक जाएगी, या यह शैतान का काम है। नाव चली। कुछ ही दशकों में भाप के जहाज़ अटलांटिक पार करने लगे। नकारात्मकता, वे कहते हैं, उसी का नुकसान करती है जो उसे पालता है।
आप अपने ही दुश्मन
उन्होंने एक जगह यह प्रश्न पढ़ा था: आपका दुश्मन कौन है? पड़ोसी, मित्र, रिश्तेदार? देर रात तक जागकर सोचते रहे, और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मनुष्य का दुश्मन वह स्वयं है: उसकी अपनी सोच और रवैया। हम प्रतीक्षा करते हैं कि कोई आकर रोशनी दिखाएगा, बीमार पड़ने, परीक्षा में फेल होने या व्यापार में घाटे पर हमें खड़ा करेगा। कोई नहीं आएगा।
ताला आपका है, वे कहते हैं, और चाबी आपके दिल के अंदर है। जल्दी उठिए, जीवन के उद्देश्य के लिए देर तक काम कीजिए, तो आप साधारण से असाधारण बन सकते हैं। चलना शुरू कीजिए, लोग पीछे आएँगे, जैसे गांधी जी के पीछे जन-सैलाब चला। अपने मित्र बनिए, अपने दुश्मन नहीं।
ताला आपका है और चाबी आपके दिल के अंदर है।
उद्देश्य खोजिए, और ठहरिए
मार्क ट्वेन ने कहा था, वे याद करते हैं, कि जीवन के दो सबसे महत्वपूर्ण दिन हैं: जिस दिन आप पैदा होते हैं, और जिस दिन समझते हैं कि क्यों पैदा हुए। अपना उद्देश्य खोजिए, और बस दौड़ते मत रहिए। जीवन को बीच-बीच में ठहराइए: संगीत सुनिए, किताब पढ़िए, मनपसंद खेल खेलिए, गुनगुनाइए, किसी मित्र के साथ टहलिए, बगीचे में जाइए। कुछ पल, जैसा पुराना गीत कहता है, बस मुस्कुराने के लिए रखिए।
कोई आपकी आलोचना करे या अपमान करे, तो प्रतिक्रिया मत कीजिए; प्रतिक्रिया उसी को ताक़त देती है। जब किसी ने बुद्ध को बहुत गालियाँ दीं, वे चुप रहे, और बाद में कहा कि उन्होंने गालियाँ स्वीकार ही नहीं कीं; अगले दिन वह व्यक्ति माफ़ी माँगने आया। परिवार के लिए समय निकालिए, और अपने गाँव और माता-पिता के पास भी जाइए।
परिवर्तनशीलता जीवन की सच्चाई है
हम बदलाव से डरते हैं और कम्फ़र्ट ज़ोन में रहना चाहते हैं, वे कहते हैं, पर परिवर्तन जीवन की सच्चाई है; बुद्ध ने सिखाया कि कुछ भी स्थायी नहीं है। हमने मोबाइल रखना सीखा। प्राथमिक उपचार भी बदल गया: पहले जले हुए स्थान को पानी से बचाया जाता था; अब डॉक्टर कहते हैं कि उसे ठंडे बहते पानी के नीचे रखिए। आशीर्वाद भी बदल गए: नवविवाहितों को कभी खूब बच्चे होने का आशीर्वाद मिलता था; आज कम ही कोई ऐसा कहेगा।
अगर आप अतीत की दुहाई देते रहेंगे, कि हमारे बाप-दादा ऐसा करते थे, पहले ऐसा होता था, तो दुख पाएँगे। नई चीज़ें सीखिए, वर्तमान में रहिए, तो उमंग और खुशी मिलेगी।
मन के कोने में आशा का दीपक
अपने लंबे अनुभव में, वे कहते हैं, युवा जल्दी निराशा और अवसाद में चले जाते हैं; एक परीक्षा में असफलता या कम अंक, और उन्हें चारों ओर अंधेरा लगता है। यह भावना मन के किसी कोने में बैठ जाती है और वहीं स्थायी घर बना लेती है। उसे कोई कोना मत दीजिए।
सकारात्मक रहना कोई नारा नहीं है। याद रखिए कि पतझड़ के बाद वसंत आता है और रात के बाद सवेरा। रात में भी आकाश में तारे और चंद्रमा हैं, जिनकी रोशनी में रास्ता नापा जा सकता है; पुराने ज़माने में लोग लालटेन की रोशनी में सब काम कर लेते थे। मन के कोने में आशा का एक दीपक जलाइए, घर के एक कोने में धूप का एक टुकड़ा रखिए, आशा भरी किताबें पढ़िए, और आशावादी लोगों के साथ रहिए। साइकिल चलाना सीखते समय हर बच्चा पहली बार गिरता है; हर असफलता कुछ सिखाती है।
मन के कोने में आशा का एक दीपक जलावें।
अच्छे बीज बोइए और धैर्य रखिए
जो किसान ज़मीन में बीज डालता है, वह रोज़ उसे खोदकर नहीं देखता कि अंकुर फूटा या नहीं, वे कहते हैं; वह उसे समय देता है। अपने काम के साथ भी ऐसा ही कीजिए। शुरू करते ही परिणाम की आशा मत कीजिए।
अंतर्मन में जो बोते हैं, वही आगे बढ़ता है। जब चारों ओर तनाव हो, तो वहाँ अच्छी चीज़ें डालिए; अच्छे बीज की तरह वे खिलेंगी और जीवन को सुगंधित करेंगी। धन्यवाद और क्षमा भी औपचारिकता से नहीं, अंतर्मन से आने दीजिए; मन से कहे जाएँ तो वे आपको बदल देते हैं।
इस लेख के वीडियो
डॉ. जैन के अपने वीडियो से लिखा गया।














