कितनी बार हमने भावना के किसी क्षण में कुछ कह दिया और बरसों पछताते रहे? या किसी विज्ञापन से प्रभावित होकर ऐसी चीज़ खरीद ली जिसकी ज़रूरत नहीं थी? डॉ. जैन किसी से भावनाएँ छोड़ने को नहीं कहते। गुस्सा, जलन, निराशा, वे कहते हैं, सब स्वाभाविक हैं। वे बस इतना चाहते हैं कि हम उनके मालिक बने रहें।
पाँच छोटी वार्ताओं में वे इसके सरल उपाय बताते हैं: तीन लंबी साँसें, तीस सेकंड की शांति, थोड़ी सहनशीलता, सहजता की आदत और एक घंटे का मौन।
भावनाओं को विवेक पर हावी न होने दें
लोग अक्सर कहते हैं कि किसी ने उन्हें भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल किया, वे कहते हैं। पर ऐसा इसलिए हुआ कि हमने अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रखा। राजा दशरथ ने भावनाओं में बहकर कैकेयी को तीन वचन दे दिए, और अंत में राम को वनवास भेजना पड़ा। विज्ञापन भी ऐसे ही काम करते हैं: बच्चे और बड़े दोनों भावुक हो जाते हैं, और हम ऐसे महँगे फ़ोन और क्रीम खरीद लाते हैं जिनकी कभी ज़रूरत नहीं थी।
भावनाएँ और निर्णय साथ रह सकते हैं, वे कहते हैं, पर भावना हावी नहीं होनी चाहिए। जब लगे कि भावना उठ रही है, रुकिए और तीन लंबी साँसें लीजिए। तब आप भावना का समझदारी से उपयोग कर पाएँगे, भावना आपका उपयोग नहीं करेगी।
भावनाओं के मालिक बनिए, गुलाम नहीं
कभी-कभी हम एक ही बात को पकड़ लेते हैं और रात को दो, तीन, चार घंटे उसी में उलझे रहते हैं, वे कहते हैं; नींद तो खराब होती ही है, स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। कोई भावना अपने आप में बुरी नहीं है। गुस्सा आए, जलन हो, असफलता का भाव आए, कोई बात नहीं: वह थोड़ी देर रहेगा और चला जाएगा। उसे पहचानिए, और उससे थोड़ा अलग होना सीखिए। सोचिए कि गुस्सा क्यों आया, जलन क्यों हुई, और क्या आज की असफलता का अर्थ है कि कल सफलता नहीं मिलेगी।
जब भावनाएँ बहा ले जाएँ, तो तीस सेकंड के लिए रुक जाइए। लंबी साँस लीजिए और उसे शरीर के हर अंग तक जाने दीजिए; एक गिलास पानी पी लीजिए, किसी को फ़ोन कर लीजिए, या प्रकृति के बीच जाकर बैठ जाइए। फिर उसकी जगह एक सकारात्मक विचार बनाइए।
भावनाओं के गुलाम ना बनें, भावनाओं के मालिक बनें।
सहन करना सीखिए
उनके अनुभव में हर नई पीढ़ी थोड़ा कम सहन करती है। युवक-युवतियाँ तुरंत प्रतिक्रिया करते हैं, बात सुनना नहीं चाहते, सामंजस्य नहीं चाहते। परिणाम है घर में तनाव और भीतर स्ट्रेस। प्रशंसा हो या गाली, सफलता हो या असफलता, हर बात प्रतिक्रिया का कारण बन जाती है।
उनका उपाय यह साफ़ देखना है कि अपमान किसका नुकसान है। कोई गाली दे या चुगली करे, वे कहते हैं, तो वह उसका कर्म है, आपका नहीं। उसने क्रोध किया, तो नुकसान उसका हुआ। उत्तर देने के बजाय चुप रहना सीखिए, मन में ईर्ष्या मत रखिए, तो सहनशीलता बढ़ेगी, और उसके साथ आपका व्यक्तित्व भी।
क्रोध तो उसने किया है, मैंने नहीं किया है।
सहज बनिए
लंबे अध्यापन जीवन में उन्होंने पाया कि सहज और सामान्य होना, महान बनने से कठिन है। यश मिल सकता है, वे कहते हैं, पर क्या हम सहज हैं? जो सामान्य रहे, उन्होंने असामान्य काम किए: नेपोलियन, कबीर, कालिदास, शेक्सपियर, मैक्सिम गोर्की। समाज में हम जितने हैं उससे बड़ा दिखने की कोशिश करते हैं, और यह बनावटीपन हमें दुखी रखता है।
अपना ग्राफ़ सीधा चलने दीजिए, वे कहते हैं। मोड़ आएँगे, मुश्किलें आएँगी, कभी सफलता भी हाथ लगेगी; हर स्थिति में वैसे ही रहिए। राम हर स्थिति में स्थितप्रज्ञ रहे। सहजता को अपना मूल मंत्र बनाइए, इससे खुशी मिलेगी।
सहज और सामान्य होना सबसे मुश्किल काम है।
एक घंटे का मौन
मौन का अर्थ, वे कहते हैं, यह नहीं कि मुँह बंद रहे और इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक, व्हाट्सऐप चलता रहे। इसका अर्थ है सारी क्रियाएँ रोककर मन को शांत होने देना। मन जैसे-जैसे शांत होता है, निर्णय सही होते हैं, आत्मचिंतन गहरा होता है, रचनात्मकता बढ़ती है, और आप फ़िज़ूल के झगड़ों से दूर रहते हैं।
गांधी जी हर सोमवार मौन रखते थे। उन्होंने जैन साधुओं को महीने में कई दिन पूर्ण मौन रखते देखा है; कुछ कहना ज़रूरी हो तो वे स्लेट पर लिख देते हैं। रोज़ किसी तय समय पर एक घंटा, या कम से कम आधा घंटा मौन का अभ्यास कीजिए, और उस समय मोबाइल का भी उपवास रखिए।
इस लेख के वीडियो
डॉ. जैन के अपने वीडियो से लिखा गया।













