2025 में आरजे सावी के साथ साक्षात्कार में डॉ. जैन ने अपनी पुस्तकों के पीछे की साधना पर विस्तार से बात की। उस बातचीत की मुख्य सीख ये हैं।
पहली पुस्तक आई तब उनकी उम्र तीस से कुछ कम थी, और, वे कहते हैं, वे इस क्षेत्र में राजस्थान के सबसे कम उम्र के लेखकों में थे।
पहली पुस्तक कच्ची थी
जब उन्होंने शुरुआत की, वे कहते हैं, न विषय का पूरा ज्ञान था, न भाषा का। उन्होंने अमेरिका से किताबें मँगाईं, उन्हें पढ़ने के लिए अंग्रेज़ी सुधारी, और रोज़ आठ-दस घंटे बैठे। पीछे मुड़कर देखते हुए वे उस पहले संस्करण को अधपकी सब्ज़ी जैसा कच्चा बताते हैं; संस्करण दर संस्करण वह बेहतर होती गई।
हिन्दी क्यों
जब विश्व इतिहास पर उनकी पहली पुस्तक आई, तब हिन्दी में इस विषय पर कोई गंभीर पुस्तक नहीं थी, और दिल्ली के कोचिंग इलाकों में आईएएस के अभ्यर्थियों ने इसी कारण उसे पढ़ा। अपने लेखन से हिन्दी और भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देना तभी से उनके ध्येय का हिस्सा रहा है। वे इसका श्रेय जयपुर में विद्यार्थी जीवन में पढ़ी हिन्दी को और अपने बड़े भाइयों को देते हैं, जिनमें से एक ने उनकी अंग्रेज़ी सुधारी। आज उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक के 29 हिन्दी संस्करण हैं, और 18 अंग्रेज़ी में।
एक अनजाना विषय
एक बार उनके प्रकाशक ने उन्हें ऐसा विषय दिया जिसके बारे में वे लगभग कुछ नहीं जानते थे। उन्होंने कहा कि वे नहीं लिख पाएँगे; उनसे कहा गया कि कोशिश कीजिए। काम शुरू हुआ, वे कहते हैं, तो आँखों में आँसू आ गए: रोज़ आठ-दस घंटे मेज़ पर, परिवार की ज़िम्मेदारियाँ, और अंत में किसी पैसे का वादा नहीं। पर जब तय कर लिया कि करना है, तो काम धीरे-धीरे बढ़ा, चीज़ें आईं और आकार लेती गईं, और रास्ते में आई टिप्पणियों व आलोचना का महत्व नहीं रहा।
सब पढ़िए, फिर चुनिए
इतिहास लिखने में भी रचनाधर्मिता चाहिए, वे कहते हैं। किसी विषय पर जो भी उपलब्ध है, वह आपकी मेज़ पर होना चाहिए; उसे पढ़िए, अपनी समझ बनाइए, फिर तय कीजिए कि क्या रखें और क्या हटाएँ। फिर आता है विश्लेषण, और आप घटनाओं की व्याख्या कैसे करते हैं।
साधारण घटनाएँ, असाधारण घटनाएँ
इतिहासकार को, वे कहते हैं, पूछना चाहिए कि कुछ घटनाएँ क्यों महत्वपूर्ण होती हैं और कुछ क्यों नहीं। जन्म सबका होता है, पर कुछ जन्म असाधारण बन जाते हैं: बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक। बड़े आक्रमण आए और गए, सेनाओं ने लूटा, मराठा आक्रमणों के कारण उदयपुर के राणा को रानियों के गहने बेचने पड़े, फिर भी उनका प्रभाव मिट गया। पर जब गांधी ने कहा “करो या मरो”, या बुद्ध ने मध्य मार्ग बताया, तो प्रभाव सदियों तक रहा। हर लेखन के पीछे, उनका मानना है, एक दर्शन होना चाहिए।
आपके लेखन में… एक फिलोसफी होना चाहिए। एक दर्शन होना चाहिए।
हाथ से
वे लैपटॉप पर नहीं लिखते। कागज़ पर, उन्हें लगता है, शब्द अपने आप निकलते आते हैं; कभी एक पृष्ठ छह बार लिखते थे, अब एक-दो बार में हो जाता है। कभी-कभी, वे कहते हैं, ऐसे शब्द आते हैं जो उन्होंने कभी सुने याद नहीं, और बाद में वे शब्दकोश में मिल जाते हैं।
जो शब्द उभर कर आते हैं, वो आत्मा से निकल कर आते हैं… और सीधे पाठक के हृदय में उतर जाते हैं।
कागज़, कट-पेस्ट नहीं
उनके परिवार ने और डॉक्टर ने भी लैपटॉप अपनाने को कहा, वे मानते हैं, पर उनसे होता नहीं। नई तकनीक में, उन्हें चिंता है, कट-पेस्ट का लालच अधिक है। वे स्क्रीन पर लिखने वाले युवाओं को खारिज नहीं करते; शायद वे बेहतर करते हों, वे कहते हैं, और यह उनकी अपनी कमज़ोरी है। पर उनके लिए शब्द कागज़ पर ही आते हैं।
पाठकों पर भरोसा
वे अपने पाठकों पर गहरा भरोसा करते हैं, वे कहते हैं, और पाठक उन्हें बताते हैं कि शब्द उन तक पहुँचते हैं। बीस से अधिक पुस्तकों के बाद आज जब वे अलमारी में रखी पहली पुस्तक देखते हैं, तो उसे कचरा कहकर हँस देते हैं। युवा लेखक के लिए सीख यह है कि ‘काफ़ी अच्छा’ होने की प्रतीक्षा मत कीजिए। शुरू कीजिए, पाठकों को ध्यान में रखिए, और हर संस्करण को पिछले से बेहतर बनाइए।
मैं अपने पाठकों पर बहुत विश्वास करता हूँ।
चलते रहिए
युवा लेखकों को उनकी सलाह वही है जो विद्यार्थियों को: निरंतर रहिए, चाहे रोज़ एक पेज; सीखते रहिए, जैसे माइकल एंजेलो ने कहा था कि वे अभी भी तूलिका पकड़ना सीख रहे हैं; और दुनिया में सबसे श्रेष्ठ बनने के लक्ष्य से शुरुआत मत कीजिए। छोटे से शुरू कीजिए, और चलते रहिए।
आप निरंतरता रखिए। कंसिस्टेंसी रखिए। चाहे एक पेज रोज़ ही लिखिए।
इस लेख के वीडियो
डॉ. जैन के अपने वीडियो से लिखा गया।











