खुशी वह विषय है जिस पर वे सबसे अधिक लौटते हैं, तीन भागों की श्रृंखला ‘खुशी का चक्र’ में और ‘पावर ऑफ़ हैप्पीनेस’ वाले दर्जनों शॉर्ट्स में। सुख भौतिक है, वे कहते हैं; खुशी आंतरिक है।
ये विचार उनके छह वीडियो से हैं: ‘खुशी का चक्र’ के तीनों भाग, हँसी पर उनकी वार्ता, और तीन शॉर्ट्स।
कुछ रचिए
कभी मोची अपने बनाए जूतों पर गर्व करता था, कुम्हार अपने दीपक पर, माँ अपनी रोटियों पर। आज हम पैसे देते हैं और उपभोग करते हैं, सृजन गायब हो गया है। एक पेज लिखिए, मैच देखने के बजाय खेलिए, पौधा लगाइए, घूमिए। स्वान्तः सुखाय किए छोटे काम, जैसे राफ़ेल ने चित्र बनाए और कालिदास ने लिखा, खुशी का चक्र घुमाते हैं।
बाहर निकलिए, पैदल चलिए
राहुल सांकृत्यायन, जिन्होंने तिब्बत और मध्य एशिया की यात्रा की और घुमक्कड़ी पर पूरी किताब लिखी, लोगों को खूब घूमने को कहते थे, और डॉ. जैन सहमत हैं: घूमना भी एक सृजन है। जो लोग पैदल कुम्भ गए और कठिनाई से डुबकी लगाई, वे कहते हैं, उन्हें वह आनंद मिला जो प्रायोजित यात्रा से ले जाए गए लोगों को नहीं मिला। दूसरों को करते देखने के बजाय स्वयं कीजिए।
अपने काम में रस लीजिए
तीन मज़दूर एक ही चर्च बना रहे थे। एक ने कहा वह पत्थर गढ़ रहा है, दूसरे ने कि रोज़ी-रोटी का मामला है, और तीसरे ने कि वह सुंदर चर्च के लिए पत्थर तराश रहा है। तीसरा सबसे खुश था। हर काम की प्रतिष्ठा है, और आनंद परिणाम पर टिके रहने से नहीं, काम में डूबने से आता है।
बैंकर और भिखारी
वे एक प्रसिद्ध यूरोपीय बैंकर का प्रसंग सुनाते हैं, जिन्होंने अपनी आत्मकथा में एक भिखारी के बारे में लिखा जिसने भोर से पहले उनकी घंटी बजाई। समय पर डाँटे जाने पर भिखारी ने कहा कि यह उसका धंधा है, और वह बैंकर को बैंक चलाना नहीं सिखाता। बैंकर ने उसके चेहरे पर चमक देखी और खुले हाथ से दिया। काम कितना ही छोटा हो, उसमें अपनी प्रतिष्ठा और विश्वास रखिए, आनंद आएगा।
सहयोग और करुणा
दो और बातें चक्र को पूरा करती हैं, वे कहते हैं: सहयोग और करुणा। वे बताते हैं कि महात्मा बुद्ध निडर होकर उस जंगल में गए जहाँ अंगुलिमाल रहता था, और उससे कहा कि मारने से पहले पेड़ की एक डाल तोड़ लाओ, फिर उसे वापस पेड़ से जोड़ दो। अंगुलिमाल ने कहा कि उसने केवल काटा है, जोड़ा कभी नहीं, और वह बुद्ध का शिष्य बन गया। दिल में सहयोग और करुणा न हो, तो न रस आता है, न खुशी।
जो है, उसमें संतोष
हम संतुष्टि बाहर, वस्तुओं और उपलब्धियों में ढूँढते हैं, पर वह आत्मा का स्वभाव है। अधिक के लिए प्रयास करते रहिए, वे कहते हैं, पर जो है उसमें खुश रहना सीखिए, और अतीत या भविष्य के बजाय वर्तमान में जीइए।
आभार व्यक्त कीजिए
आभार एक कला है: शब्दों में, लिखकर, आँखों से। इससे दो लोगों के बीच एक बंधन बनता है। प्रकृति को पानी, हवा और मिट्टी के लिए धन्यवाद दीजिए; किसान, दूधवाले, सब्ज़ी वाले को; अपने माता-पिता को। हर सुबह, मन ही मन ही सही।
बिना कारण हँसिए
बच्चे पूरा हँसते हैं और पूरा रोते हैं, वे कहते हैं; कहीं हम यह भूल जाते हैं। वे तीन साधुओं की चीनी कथा सुनाते हैं जो गाँव-गाँव हँसते घूमते थे, यहाँ तक कि पूरी गलियाँ रुककर उनके साथ हँसने लगतीं। जब एक का देहांत हुआ, तो बाकी दो चिता पर हँसे, क्योंकि पहले जाने की शर्त वह जीत गया था, और उसके कपड़ों से निकले रंगों ने गाँव को एक बार फिर हँसा दिया। हँसी में कंजूसी मत कीजिए।
आप हँसने के लिए कोई कारण ना ढूँढें।
खुशी एक प्रतिध्वनि है
खुशी दीजिए, और अधिक लौटकर आती है। वे उन्नीसवीं सदी के रूसी लेखक इवान तुर्गनेव का प्रसंग सुनाते हैं, जिनके पास एक भिखारी को देने के लिए कुछ नहीं था, तो उन्होंने उसका हाथ थामा, कंधे पर हाथ रखा और हालचाल पूछा। यह भी देने का एक तरीका है।
खुशी देने से अधिक खुशी लौटती है।
साथ-साथ, बरसात में
बरसात में पेड़ों के बीच रिकॉर्ड की गई एक हल्की-फुल्की वार्ता में वे एक सरल रिवाज़ सुझाते हैं: बरसात के दिन परिवार के साथ मिलकर पकौड़ी बनाइए, हो सके तो बाहर, और सारा काम किसी एक पर मत छोड़िए। मोबाइल और भागदौड़ से दूर, ऐसे छोटे साझा पल परिवार में प्रेम बढ़ाते हैं और तनाव घटाते हैं। बच्चों को खेतों में ले जाइए, वे जोड़ते हैं, और उन्हें समझने दीजिए कि बरसात और पानी का क्या महत्व है।
इस लेख के वीडियो
डॉ. जैन के अपने वीडियो से लिखा गया।















